
इस समय पुलिस द्वारा एनकाउंटर में अपराधियों के मारे जाने की चर्चा खूब चल रही है यह सामायिक विषय है इसलिए इस पर खुद को लिखने से रोक नहीं सका…….
निश्चित रूप से सजा देने के उद्देश्य से किसी अपराधी को पुलिस द्वारा मार देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है…एवं कानून कभी इसकी इजाजत नहीं देता ।
किंतु क्या यह न्यायपालिका की न्याय देने में विफलता का परिणाम नहीं है ?
आज न्यायालयों में समर्थ लोगों द्वारा अपराध करने के बाद भी उनपर प्रभावी कार्रवाई करने में न्यायालय की अक्षमता, संगठित अपराधियों के संदर्भ में उनके विचारण के दौरान उनको अति महत्वपूर्ण ट्रीटमेंट देना उनका न्यायालय में उपस्थित होने का फिल्मी स्टाइल एवं उनके मुकदमों की पेशी के दिन जनसामान्य के मुकदमों के प्रति उपेक्षा व्यक्त करना धनबल के समक्ष न्याय व्यवस्था के समर्पण को ही ब्यक्त करता है।
हमने अधिवक्ता होने के नाते अपनी आंखों से उनका लगातार लकदक कपड़ों में महंगी गाड़ियों की रेलम पेल के बीच अदालत में उपस्थित होकर कानून के समक्ष समता के सिद्धांत को ठेंगा दिखाते देखा है। अपराधियों को न्याय कक्ष में न्यायालय के कर्मचारियों से गलबहिया करते देखा है।
क्या एक आम वादकारी जिस पर फर्जी मुकदमे कायम होने के बाद भी सारा जीवन न्याय के आस में न्यायालय में एड़ियां रगड़ने के लिए मजबूर होते एवं वीआईपी व्यक्तियों के द्वारा अपराध किए जाने के बाद भी राजसी ठाट बाट के साथ न्यायालयों में प्राथमिकता से अपने मुकदमों का निर्णय करवाती देखना न्याय प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह नहीं उठाता है?
क्या वास्तव में सभी लोग न्यायालय के समक्ष बराबर हैं क्या वास्तव में न्यायालय सबके साथ बराबर का ट्रीटमेंट देता है,?
क्या एक सामान्य वादकारी से भी अदालत में इसी तरीके का व्यवहार होता है??
क्या अदालत में वास्तव में न्याय हो पा रहा है ? या न्यायाधीश केवल अपना कोटा निस्तारण करने में व्यस्त हैं।
सच तो यह है कि न्यायालयों में भारी भरकम मुकदमों का बोझ न्यायालय के लिए नियुक्त किए गए कर्मचारियों और जजों की संख्या के सापेक्ष अत्यधिक है ।
अब न्यायालय न्याय नहीं निस्तारण करते हैं। जिससे जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत चरितार्थ हो रही है।
इन सब का परिणाम है कि लोगों का न्यायपालिका से न्याय पाने की उम्मीदें कम हुई है । परिणामस्वरूप लोगों को अपराधियों के विरुद्ध यह पुलिसिया कार्यवाही भा रही है।
यह सब वे परिस्थितियां हैं जिससे लोगों का न्याय व्यवस्था पर से धीरे-धीरे विश्वास उठ रहा है।
यह सारे अनुत्तरित प्रश्न जनता को दुर्दांत अपराधियों के गैर कानूनी तरीके से एनकाउंटर में मारे जाने पर प्रसन्न कर रहे हैं।
भगवान परशुराम भी तो यही करते थे।
नो कचहरी नो केस
जस्टिस आन प्लेस।।
मारुति कुमार राय
(लेखक ,एक अधिवक्ता हैं और इस लेख में लिखे विचार उनके निजी अनुभव पर आधारित हैं )



