
काशीपुराधिपति भगवान शिव की नगरी वाराणसी में प्रत्येक पूर्णिमा पर श्री काशी विश्वनाथ महाराज का विशेष दिव्य श्रृंगार किया जाता है। बाबा विश्वनाथ का यह रूप अत्यंत मनोहारी और अलौकिक होता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु काशी पहुंचते हैं।
पूर्णिमा के अवसर पर होने वाले विशेष श्रृंगार की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1. दिव्य महाअभिषेक और सुगंधित द्रव्यों का प्रयोग
* पूर्णिमा की संध्या को बाबा का विशेष महाअभिषेक किया जाता है।
* इसमें दूध, दही, घी, शहद, और गंगाजल के साथ-साथ विशेष रूप से इत्र (सुगंधित तेल), गुलाब जल, और चंदन का उपयोग किया जाता है, जिससे पूरा गर्भगृह महक उठता है।
2. फूलों का अलौकिक श्रृंगार
* इस अवसर पर बाबा के ज्योतिर्लिंग और गर्भगृह को ऋतु के अनुसार विशेष सुगंधित फूलों से सजाया जाता है।
*गेंदा, गुलाब, बेला, चमेली और कमल के फूलों की भव्य मालाएं बाबा को अर्पित की जाती हैं। इसके साथ ही बाबा के प्रिय बिल्वपत्र (बेलपत्र) और धतूरे से विशेष कलाकृतियां बनाई जाती हैं।
3. रजत (चांदी) के मुखौटे का धारण
* पूर्णिमा के श्रृंगार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दिन बाबा विश्वनाथ को उनका भव्य रजत मुखौटा (चांदी का स्वरूप) धारण कराया जाता है।
* इस दिव्य रूप में बाबा के तीन नेत्र (त्रिनेत्र) और मस्तक पर अर्धचंद्र का सुंदर रूप निखर कर आता है।
4. विशेष महाआरती और भोग
* श्रृंगार पूर्ण होने के बाद बाबा की भव्य सप्तर्षि आरती या श्रृंगार आरती होती है। डमरू, शंख और घंटियों की ध्वनि से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठता है।
* इस दिन बाबा को विशेष छप्पन भोग या विशेष मिष्ठान्न और ऋतु फलों का भोग लगाया जाता है, जिसे बाद में भक्तों में वितरित किया जाता है।
> मान्यता: काशी में मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होते हैं और चूंकि भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया है, इसलिए इस दिन बाबा के दर्शन और इस अलौकिक श्रृंगार को देखने से मानसिक शांति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
यदि आप पूर्णिमा के दिन काशी में हैं, तो संध्या काल की **श्रृंगार आरती** का दर्शन बिल्कुल न चूकें। यह अनुभव साक्षात शिवलोक की अनुभूति कराने वाला होता है।
**हर हर महादेव!**


